04 जनवरी 2026

उँगलियाँ बनी आँखें, बिन्दु बने अक्षर

04 जनवरी को ब्रेल दिवस के रूप में मनाया जाता है. संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2018 में आधिकारिक रूप से 04 जनवरी को विश्व ब्रेल दिवस घोषित किया. इसके बाद ही पहला अंतरराष्ट्रीय ब्रेल दिवस 04 जनवरी 2019 को मनाया गया. यह दिवस लुईस ब्रेल के सम्मान में मनाया जाता है, जिन्होंने दृष्टिहीनों के लिए एक लिपि का निर्माण किया. उनके नाम पर ही इस लिपि को ब्रेल लिपि कहते हैं. इस लिपि में बिन्दु का प्रयोग किया जाता है और इनको उँगलियों के पोरों के सहारे छू कर महसूस किया जाता है. एक-एक बिन्दु के स्पर्श से शब्द का निर्माण होता है और दृष्टिहीन व्यक्ति अपनी पढ़ाई को पूरा करता है.

 


लुईस ब्रेल का जन्म फ्रांस के कुप्रे गाँव में 04 जनवरी 1809 को हुआ था. मात्र तीन वर्ष की उम्र में खेलते समय चाकू जैसे एक औजार की चोट से उनकी एक आँख में चोट लग गई. आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण बच्चे लुईस को सही से इलाज न मिल सका. इस कारण से चोटिल आँख का इन्फेक्शन दूसरी आँख में भी फैल गया. इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि आठ वर्ष की उम्र तक आते-आते लुईस पूरी तरह नेत्रहीन हो गए. लुईस जब बारह वर्ष के हुए उसी समय उनको जानकारी मिली कि फ्रांसीसी सेना के लिए ‘नाइट राइटिंग’ नामक एक खास कूटलिपि बनाई गई है, इस लिपि के द्वारा सैनिक अंधेरे में गुप्त संदेश पढ़ सकते हैं. लुईस ने अपने स्कूल के पादरी के माध्यम से इस कूटलिपि को विकसित करने वाले कैप्टन चार्ल्स बार्बर से मुलाकात की. इनसे मुलाकात के बाद ही उनके मन में नेत्रहीनों के लिए एक लिपि बनाने का विचार आया. इसके बाद सन 1829 तक छह बिन्दुओं पर आधारित ‘ब्रेल लिपि’ तैयार कर ली.

 

वर्तमान में इस लिपि की तकनीक को इतना उन्नत कर लिया गया है कि अब इसका उपयोग कम्प्यूटर कीबोर्ड और स्मार्टफोन के सॉफ्टवेयर में भी व्यापक रूप से किया जा रहा है.


01 जनवरी 2026

मोबाइल से इतर भी है ज़िन्दगी

नववर्ष 2026 का आगमन हो गया है. हम सभी ने उसके स्वागत में अपनी पर्याप्त ऊर्जा और शक्ति को लगा दिया. इस आते वर्ष के साथ क्या हमने अपने उन वायदों की तरफ ध्यान दिया जिनको वर्ष 2025 के शुरू में खुद से किया था? शायद नववर्ष के स्वागत के उत्साह में ऐसा करने की याद नहीं रही. चलिए कोई बात नहीं, जब जागो तभी सबेरा वाली बात के द्वारा नए वर्ष 2026 के साथ अभी-अभी गए वर्ष 2025 के एक घटनाक्रम को याद कर लेते हैं. मैनेजमेंट गुरु के रूप में प्रसिद्ध एन. रघुराजन ने कहा कि 2025 एक स्लोगन के साथ विदा हो रहा है- मोबाइल फोन के परे भी ज़िन्दगी है. उन्होंने अपने कॉलम में एक कार्यक्रम का जिक्र करते हुए लिखा कि प्रवेश द्वार पर एक बड़े बोर्ड पर लिखा था कि अपना मोबाइल फोन निकालें और मेरी तस्वीर लें. जैसे ही आप प्रवेश द्वार पर अभिवादन कर रहे महिला या पुरुष की तस्वीर लेते हैं तो वे बेहद शालीनता से आपके फोन के कैमरा लेंस पर एक छोटा सा आयताकार स्टिकर चिपका देते हैं. किसी मेहमान ने इसका विरोध नहीं किया. वहीं दूसरे बोर्ड पर लिखा था कि हर बीस मेहमानों पर एक फोटोग्राफर है, उनसे जितनी चाहें तस्वीरें खिंचवाइए.

 

यह आईडिया कोई नया-नवेला नहीं है. इसे बर्लिन, लंदन और न्यूयॉर्क के मशहूर क्लबों से लिया गया है. यहाँ पर लम्बे समय से जोर दिया जाता रहा है कि वहाँ आने वाले मेहमान फोन से तस्वीरें लेना छोड़ संगीत की धुनों पर नाचें. पहले इन क्लबों में फोन प्रतिबंधित थे लेकिन अब उन पर स्टिकर लगाया जाता है. एक पल को अपने मोबाइल को जेब में डालकर सोचिए इन दोनों निवेदनों के बारे में. सोचा आपने? आप किसी कार्यक्रम का हिस्सा हैं, उसमें सहभागिता कर रहे हैं और आपका बहुत सारा समय कार्यक्रम का आनंद उठाने के बजाय फोटोग्राफी में खर्च होता है. ये समय कभी सेल्फी के नाम पर, कभी कार्यक्रम के फोटो-वीडियो बनाने के नाम पर, कभी मित्रों-परिचितों-परिजनों के साथ फोटोसेशन करवाने के नाम पर खर्च होता है. क्या कभी आपने-हमने एक पल को रुककर ये सोचा है कि उस कार्यक्रम में हमारी उपस्थिति किसलिए हुई है? हम वहाँ कार्यक्रम का आनंद उठाने के लिए उपस्थित हुए हैं अथवा फोटोग्राफी करने के लिए?

 



वर्तमान दौर में यह बहुत बड़ी समस्या बनती जा रही है कि हम सभी सामने उपस्थित पलों का आनंद उठाने के बजाय इधर-उधर के कार्यों में अपना समय बर्बाद कर देते हैं. इस समय बर्बादी में मोबाइल को सबसे आगे रखा जा सकता है. सिर्फ फोटोग्राफी की ही बात न करें, सिर्फ किसी कार्यक्रम की बात न करें तो भी यदि गौर करें तो लगभग प्रत्येक नागरिक का एक दिन का बहुतायत समय मोबाइल पर व्यतीत हो रहा है. हम सभी किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में शामिल हों अथवा किसी पारिवारिक कार्यक्रम में, कहीं नितांत फुर्सत के पलों में हों या फिर व्यस्तता भरे किसी दौर में मोबाइल से खुद को दूर नहीं कर पाते हैं. भीड़ के बीच में भी हम सब मोबाइल के कारण अकेले होते हैं.

 

मैनेजमेंट गुरु द्वारा बताया गया तरीका चूँकि अब निजी और हाई-प्रोफाइल पार्टियों में अपनाया जा रहा है और इसका मुख्य उद्देश्य यही है कि उन पार्टियों में, कार्यक्रमों में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति वहाँ के पलों का आनंद ले सके. ऐसा बहुतायत में देखने में आता है और लेखक का अपना नितांत व्यक्तिगत अनुभव है कि कार्यक्रमों के दौरान फोटो-वीडियो निकालने वाले बहुतायत लोग शायद ही दोबारा उनको देखते हों. उनमें से बहुसंख्यक लोग ऐसे होते हैं जो कार्यक्रम के बाद ही फोटो और वीडियो डिलीट करते देखे गए. ऐसा इसलिए क्योंकि उनके मोबाइल में स्टोरेज की समस्या उत्पन्न होने लगती है. कोरोनाकाल के दौरान लॉकडाउन में मोबाइल का उपयोग बढ़ने से भले ही कुछ लोगों की दिनचर्या में इसका उपयोग शामिल हो गया हो किन्तु समय के साथ लोग महसूस करने लगे कि पूरी तरह स्क्रीन पर टिकी ज़िन्दगी ही असल में जीवन नहीं है. एक शोध के आँकड़े बताते हैं कि सोशल मीडिया पर बिताया जाने वाला समय वर्ष 2022 में चरम पर था और वर्ष 2024 में इसमें दस प्रतिशत की गिरावट दिखाई दी.

 

मोबाइल उपयोग के प्रति जिस तरह की ललक लोगों में देखी गई थी, उसी तरह की वितृष्णा भी अनेक लोगों में देखने को मिल रही है. यहाँ अनेकानेक अनुभवों को सामने रखने का मंतव्य कदापि यह नहीं कि मोबाइल को पूरी तरह से नकार दिया जाये. यहाँ उद्देश्य मात्र इतना ही है कि मोबाइल के उपयोग के साथ-साथ यह भी ध्यान रखा जाये कि परिवार की अहमियत हमारे लिए क्या है? बच्चों का मैदान पर जाकर खेलना-कूदना कितना महत्त्वपूर्ण है? सामाजिकता के निर्वहन के लिए आज सहभागिता आवश्यक है अथवा मोबाइल का उपयोग? परिवार के साथ समय का बिताना किसी स्वप्न की तरह से हो गया है. मित्रों के साथ शाम की महफ़िलें किसी गुजरे दौर की बातें हो गईं हैं. बच्चों की हँसी, खिलखिलाहट से गुलजार रहने वाले पार्क अब बुजुर्गों के अकेलेपन के साक्षी बन रहे हैं. यह अपने आपमें कितना विद्रूपता भरा होगा कि आने वाली पीढ़ी के लिए हम इस तरह के अकेलेपन के, सुनसान के, तन्हाई के अनुभव इकट्ठे करने में लगे हैं.

 

नववर्ष की आज की इस पहली सर्द सुबह में चाय की चुस्की लेते हुए अपने मोबाइल को देखिएगा कि आपने ऐसे कितने फोटो-वीडियो हैं जो अब तक अनदेखे और बेमतलब ही मोबाइल में जगह घेरे हैं. निश्चित ही इनकी बहुत बड़ी संख्या होगी. यदि आप हमारी बात से सहमत हैं तो चाय की चुस्की के साथ नववर्ष में वादा करिए मोबाइल के बजाय अपने लोगों के साथ अधिक से अधिक समय बिताने का. आभासी अनुभवों को एकत्र करने के स्थान पर वास्तविक अनुभवों को संजोने का. याद रखिये केवल एक ही बात कि मोबाइल फोन से परे अनुभवों से भरी एक शानदार ज़िन्दगी है.

 


25 दिसंबर 2025

स्वतंत्रता के नाम पर अमर्यादित होते युवा

दिन का समय, चलती ट्रेन का डिब्बा, दो विषमलिंगी युवा, बेशर्म-अमर्यादित आचरण, सार्वजनिक रूप से होती अंतरंगता. अभी हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल हुए उन वीडियो ने दिखाया कि किस तरह से देह की माँग और यौनेच्छा की पूर्ति ने पारम्परिक मान्यताओं को ध्वस्त ही कर दिया. चलती ट्रेन के सार्वजनिक कोच में नितांत बेशर्मी के साथ युवाओं की गतिविधियों ने समाज की इस प्रचलित धारणा को और बल दिया कि आज की पीढ़ी संस्कारों, मर्यादा को भूलकर स्वार्थ में लिप्त होती चली जा रही है. इस घटना के पहले भी युवाओं की अंतरंगता सम्बन्धी वीडियो, चित्र सोशल मीडिया पर वायरल होते रहे हैं. इन वीडियो, चित्रों में युवा बदलते रहे, उनके संसर्ग करने के स्थान बदलते रहे मगर सभी में मानसिकता एक ही रही, अपने परिवेश, अपने संस्कार, अपनी मर्यादा का त्याग करना. कॉलेज, लाइब्रेरी, पार्क, लिफ्ट, बाज़ार, पार्किंग आदि-आदि सार्वजनिक स्थल खुलेआम बेशर्मी भरे कृत्यों के गवाह बनने लगे.

 

वैश्वीकरण, आधुनिकता के दौर में ऐसा बहुत पहले से ही मान लिया गया था कि खुद के स्वतंत्र अस्तित्व के लिए युवाओं ने किसी भी तरह के बंधन को मानना बंद कर दिया है. अभिभावकों को एक दोस्त की तरह से मान लेने की अवधारणा ने भी उनके प्रति गम्भीरता का ह्रास करवा ही दिया था. इस तरह की मानसिकता, सोच ने युवाओं को जहाँ आर्थिक स्वतंत्रता प्रदान की, उनको स्वावलम्बी बनाया वहीं उनको उन्मुक्त भी बनाया, उद्दंड भी बनाया. ऐसे उन्मुक्त, उद्दंड युवाओं ने सामाजिक परिदृश्य में सिर्फ और सिर्फ स्वयं का ही अस्तित्व स्वीकारते हुए शेष सभी को नगण्य मान लिया है. इनको न तो उम्र का लिहाज है, न ही रिश्तों का. यही कारण है कि इनके द्वारा सार्वजनिक स्थानों पर भीड़ की, किसी बुजुर्ग व्यक्ति की परवाह न करते हुए अशालीन ढंग से प्रेमालाप किया जाता है, नशेबाजी की जाती है, स्टंट किये जा रहे हैं अब तो यौन-सम्बन्ध भी बनाये जाने लगे हैं. सड़कों, पार्कों, मॉल, बाजार आदि में एक-दूसरे का हाथ पकड़ कर घूमने से इतर अब तो एक-दूसरे के साथ चुम्बन लेते हुए भी युवा जोड़े दिख जाना आम हो गया है. उन्मुक्तता, उद्दंडता का आलम ये है कि इनको ये भी परवाह नहीं होती है कि वर्तमान दौर में जगह-जगह लगे सीसीटीवी कैमरों के द्वारा उनके कृत्य रिकॉर्ड हो रहे होंगे. उनको इस बात की भी चिंता नहीं कि आज प्रत्येक हाथ में स्मार्टफोन होने के कारण किसी भी कृत्य की, घटना की रिकॉर्डिंग हो जाना, उसका वायरल हो जाना बहुत सामान्य सी बात हो गई है.

 

ऐसी घटनाओं के पीछे के कारणों को खोजने और उनका समाधान करने पर गम्भीरता से चिंतन करने के बजाय यह कह देना आसान लगता है कि ये सब पश्चिमी सभ्यता का दुष्प्रभाव है, यह सब वैश्वीकरण के कारण हो रहा है. क्या हम सभी ने ऐसी घटनाओं के सामने आने के बाद भी ये विचार किया है कि हम अपने परिवार के किशोरों, युवाओं के कृत्यों, उनके व्यवहार, उनके दोस्तों आदि के बारे में जानने-समझने का प्रयास करें? क्या अपने परिवार के बच्चों के पहनावे, उनकी दिनचर्या आदि में आने वाले बदलावों को लेकर कभी उनसे कोई सवाल किया है? बहुतायत में इनका जवाब न में ही होगा क्योंकि आज बहुतायत परिवारों में बच्चों को समझाने की, उनको संस्कार सिखाने की, उनको मर्यादित आचरण करने की सीख देना लगभग बंद ही हो गया है. आज के आधुनिकता भरे दौर में ऐसा करना दकियानूसी माना जाने लगा है, पिछड़ा माना जाने लगा है और शायद ही कोई परिवार ऐसा होगा को स्वयं को दकियानूसी-पिछड़ा घोषित करवाना चाहेगा.

 

संस्कार सिखाने का तात्पर्य किशोरों, युवाओं को जंजीरों में बाँधना नहीं होता है बल्कि उनको सामाजिकता का ज्ञान देना होता है. उनको मर्यादित बनाने का अर्थ पाषाणकालीन सभ्यता में भेजना नहीं होता बल्कि उम्र-रिश्तों का सम्मान करना सिखाना होता है. शालीन बनाने का तात्पर्य उनको पिछड़ा बनाना नहीं होता बल्कि उचित जीवनशैली का निर्वहन करना बताना होता है. प्रत्येक कार्य को भौतिकता से जोड़ देना, किसी भी तरह के आचरण को स्वतंत्रता समझ लेना, सार्वजनिक रूप से अशालीन हो जाने को आधुनिक मान लेना कदापि उचित सोच नहीं है. यदि इस तरह की सोच पर, ऐसे कृत्यों पर नियंत्रण नहीं लगाया गया, परिवार से ही संस्कारों का बीजारोपण नहीं किया गया तो ऐसी स्थितियों के निकट भविष्य में और भयावह होने में कोई संशय नहीं.


22 दिसंबर 2025

अन्तरिक्ष तक दिव्यांगजन की उपस्थिति

बीसवीं सदी के अंतिम वर्षों में हुए अनेकानेक परिवर्तनों को देखते हुए ऐसा माना जाने लगा था कि ज्ञान, विज्ञान, आधुनिकता, तकनीकी, प्रौद्योगिकी, बौद्धिकता, स्वतंत्रता आदि के सन्दर्भ में इक्कीसवीं सदी क्रांतिकारी सदी होगी. ऐसा बहुत हद तक हुआ भी. समाज ने इस सदी में बहुत से बंधनों से स्वयं को मुक्त किया, विकास के अनेक नए मानकों को प्राप्त किया. बावजूद इसके बहुत से क्षेत्र ऐसे रहे जिनको लेकर समाज की सोच में बदलाव नगण्य रूप में देखने को मिला. दिव्यांगजनों के प्रति अभी भी समाज का दृष्टिकोण सहानुभूति, दया दर्शाने वाला बना हुआ है. सभी क्षेत्रों में अपनी सशक्त उपस्थिति को प्रदर्शित करने के बाद भी दिव्यांगजनों को कमजोर कड़ी के रूप में देखा जाता है. इसके बाद भी दिव्यांगजनों ने अपने कार्यों, अपनी क्षमताओं, अपने आत्मबल के द्वारा लगातार स्वयं को सिद्ध किया है. इस 20 दिसम्बर को जर्मनी की दिव्यांग इंजीनियर माइकला बेंथॉस ने इतिहास रचते हुए नवीन उपलब्धि हासिल की है. जर्मन एयरोस्पेस इंजीनियर माइकला रॉकेट पर उड़ान भरने वाली पैरालिसिस से ग्रस्त पहली इंसान बन गईं हैं.

 



दिव्यांग माइकला ने सबसे अलग हटते हुए अपना अलग रास्ता बनाया और खुद को अन्तरिक्ष तक पहुँचा दिया. उन्होंने अमेरिका के वेस्ट टेक्सास से ब्लू ओरिजिन के न्यू शेपर्ड रॉकेट से उड़ान भरी और अन्तरिक्ष में अपनी उपस्थिति के द्वारा दिव्यांगजनों की जिजीविषा और क्षमता की उपस्थिति दर्ज की. व्हीलचेयर का प्रयोग करने वाली वे पहली व्यक्ति बन गई हैं जिसने अन्तरिक्ष की उड़ान भरी. ब्लू ओरिजिन के एनएस-37 मिशन में 33 वर्षीया माइकला के साथ पाँच अन्य यात्री भी शामिल थे. उड़ान भरने के बाद रॉकेट ने कर्मन रेखा को पार किया. यह रेखा अन्तरिक्ष की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सीमा है, जो पृथ्वी की सतह से लगभग 100 किमी ऊपर है. इस रेखा का नामकरण वैमानिकी और अन्तरिक्ष विज्ञान में सक्रिय इंजीनियर थियोडोर वॉन कर्मन के नाम पर किया गया है. वह पहले व्यक्ति थे जिन्होंने इस ऊँचाई की गणना करते हुए बताया था कि इस ऊँचाई पर वायुमंडल इतना पतला हो जाता है कि वहाँ हवाई उड़ान सम्भव नहीं है.

 



आज से लगभग सात वर्ष पूर्व, 2018 में माइकला एक माउंटेन बाइक दुर्घटना में घायल हो गईं थीं. उस दुर्घटना में रीढ़ की हड्डी क्षतिग्रस्त होने के कारण वे कमर के नीचे लकवाग्रस्त हो गई थीं. जिसके बाद उन्होंने व्हीलचेयर का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था. इस दुर्घटना के बाद जब वे व्हीलचेयर का इस्तेमाल करने लगीं तो उनको लगा था कि उनका अन्तरिक्ष यात्री बनने का बचपन का सपना कभी पूरा नहीं हो पाएगा. व्हीलचेयर पर अपने सारे काम करने के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और अन्तरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में काम करती रहीं. अन्तरिक्ष यात्रा करने के बचपन के सपने को पूरा करने के लिए माइकला लगातार इसके लिए प्रयासरत भी रहीं और कार्य भी करती रहीं. इसके लिए उन्होंने पैराबोलिक ज़ीरो-ग्रेविटी फ़्लाइट्स में हिस्सा लिया, जो भारहीनता (जीरो-ग्रेविटी) की नकल करती है. इसके अलावा उन्होंने पोलैंड में व्हीलचेयर-एक्सेसिबल लूनारेस रिसर्च स्टेशन पर दो हफ़्ते के अनुरूप अन्तरिक्ष यात्री (एनालॉग एस्ट्रोनॉट) मिशन के दौरान मिशन कमांडर के तौर पर काम भी किया. उनके पास मानव अन्तरिक्ष उड़ान से जुड़ा काफी अनुभव भी है. वे एक जर्मन एयरोस्पेस और मेक्ट्रोनिक्स इंजीनियर हैं जो अभी यूरोपियन स्पेस एजेंसी के साथ यंग ग्रेजुएट ट्रेनी के तौर पर जुड़ी हुई हैं.

 

ब्लू ओरिजिन के न्यू शेपर्ड रॉकेट की यह यात्रा लगभग दस मिनट की रही. इस दौरान यात्रियों ने भारहीनता अर्थात ज़ीरो-ग्रेविटी का अनुभव किया और पृथ्वी का अद्भुत नज़ारा देखा. माइकला की इस स्वप्निल उड़ान के समय उनके साथ स्पेस एक्स के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी हैंस कोएनिग्समैन भी थे, जिन्होंने इस यात्रा को सम्भव बनाने में मदद की. इसके लिए रॉकेट में किसी तरह का व्यापक ढाँचागत परिवर्तन नहीं करना पड़ा था. एक विशेष ट्रांसफर बोर्ड और माइकला की स्थिति के अनुकूल कैप्सूल व्यवस्था के द्वारा उनको उड़ान के लिए तैयार किया गया. चूँकि माइकला व्हीलचेयर का उपयोग करती हैं, ऐसे में उनको रॉकेट में चढ़ने के लिए तथा वहाँ अपनी सीट तक पहुँचने के लिए एक विशेष ट्रांसफर बोर्ड का उपयोग किया गया. इस विशेष बोर्ड की सहायता से वे अपनी व्हीलचेयर को धरती पर छोड़ खिसककर सीट पर बैठ सकीं. अपनी शारीरिक स्थिति के बावजूद उन्होंने इस ऐतिहासिक उप-कक्षीय यात्रा में भाग लिया. उड़ान के दौरान उन्हें भारहीनता का अनुभव हुआ.

 



अन्तरिक्ष से लौटने के बाद माइकला ने कहा कि यह उनके जीवन का सबसे शानदार अनुभव था. कभी अपने सपनों को मत छोड़ो. दुनिया अभी भी दिव्यांगों के लिए पूरी तरह सुलभ नहीं है. अभी भी और अधिक बदलावों की जरूरत है. उन्होंने अपील की कि दिव्यांगजनों के लिए दुनिया को अधिक सुलभ  बनाया जाये ताकि भविष्य में उनके जैसे और लोग भी अन्तरिक्ष की यात्रा कर सकें. इस मिशन में उनका चयन इस बात का प्रमाण है कि शारीरिक अक्षमता सपनों के आड़े नहीं आ सकती. उनकी इस ऐतिहासिक उड़ान से दिव्यांगों के लिए अन्तरिक्ष यात्रा के द्वार खुलने की एक शुरुआत अवश्य हुई है. सम्भव है कि भविष्य में और भी दिव्यांग अन्तरिक्ष की यात्रा कर सकें. यह भी सम्भव है कि अब समाज दिव्यांगजनों के प्रति अपनी संकीर्ण सोच को त्यागकर उन्हें भी एक सामान्य इंसान की तरह से जानने-समझने का प्रयास करे.  


20 दिसंबर 2025

ज़िन्दगी जिन्दाबाद का घोष जल्द ही आपके साथ होगा

वर्ष 2025 भी जाने की तैयारी कर रहा है. जितने दिन इस अंतिम महीने में निकल गए हैं, अब उतने दिन भी शेष नहीं बचे हैं. समय की गति के अनुसार आना और जाना लगा ही रहना है. कल को इसी वर्ष का स्वागत किया था, अब इसी को विदा करने का समय आ गया है. कुछ ऐसा ही आने वाले वर्ष 2026 के साथ भी होगा. इन आते-जाते वर्षों के स्वागत और विदाई के बीच याद बस यही रह जाता है कि उस एक वर्ष में हम सबने क्या किया? क्या पाया, क्या खोया? क्या सुखद रहा, क्या दुखद रहा?


आप सभी सुधिजनों को याद होगा कि वर्ष 2019 में आत्मकथा ‘कुछ सच्ची कुछ झूठी आपके बीच हमारी बातों को लेकर उपस्थित हुई थी. उसी समय हमारे शुभेच्छुजनों ने प्रेरित किया था कि वर्ष 2005 में हुई दुर्घटना के बाद की अपनी जीवन-यात्रा को भी एकसूत्र में पिरोकर प्रकाशित करवाया जाये. विचार तो था कि वर्ष 2020 में इसे भी ‘ज़िन्दगी जिन्दाबाद के रूप में प्रकाशित करवाया जायेगा. अक्सर ऐसा होता है कि सोचा कुछ जाता है और हो कुछ जाता है, हमारे साथ भी यही हुआ. ज़िन्दगी जिन्दाबाद का घोष करने बैठे तो हाथों ने काँपना शुरू कर दिया, आँखों ने नम होना शुरू कर दिया, दर्द ने अपना अलग रूप दिखाना शुरू कर दिया. इन सबके बीच कुछ दुखद घटनाओं ने हिला दिया और ज़िन्दगी जिन्दाबाद को बीच में रोक देना पड़ा. यद्यपि समय के दिए गए आघातों से उबरते हुए ज़िन्दगी जिन्दाबाद को ब्लॉग पर कहानी के रूप में लिखते रहे.

 



इसी लेखन को एडिट करके, पुस्तक के रूप में संयोजित करके इस जाते हुए वर्ष 2025 में आप सबके बीच लाने का मन बना लिया है. जल्दी ही ‘ज़िन्दगी जिन्दाबाद को आप सब अपने बीच पाएँगे. ‘कुछ सच्ची कुछ झूठी की तरह आप सबका स्नेह ‘ज़िन्दगी जिन्दाबाद को भी मिलेगा, ऐसा विश्वास है.